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अपना-अपना भाग्य

ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 5

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पाठ का परिचय (Introduction):

'अपना-अपना भाग्य' जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक और यथार्थवादी कहानी है। यह कहानी समाज की उस उदासीनता और संवेदनहीनता पर गहरा व्यंग्य करती है जहाँ अमीर लोग तो अपने महलों में जीवन का आनंद लेते हैं, जबकि एक गरीब और बेसहारा बच्चा कड़ाके की ठंड में तड़प-तड़प कर मर जाता है। कहानी यह प्रश्न उठाती है कि क्या वास्तव में यह 'भाग्य' का ही खेल है, या हमारे शोषक समाज की निर्दयता का परिणाम?

1. लेखक परिचय (Author Introduction)

रचनाकार: जैनेन्द्र कुमार (Jainendra Kumar)

जैनेन्द्र कुमार जी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार हैं। उनका जन्म 1905 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनकी कहानियों में समाज की बाहरी समस्याओं के साथ-साथ व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष, मनोविज्ञान और दर्शन का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। उन्हें मुंशी प्रेमचंद का उत्तराधिकारी भी माना जाता है।
प्रमुख रचनाएँ: फाँसी, वातायन, एक रात, खेल, पाजेब (कहानी संग्रह) और सुनीता, त्यागपत्र (उपन्यास)।

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2. प्रमुख पात्र (Character Sketch)

3. कहानी का सार (Summary)

कहानी की पृष्ठभूमि नैनीताल की है, जहाँ कड़ाके की ठंड पड़ रही है। लेखक अपने एक मित्र के साथ नैनीताल की माल रोड पर घूम रहे थे। चारों ओर बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ थीं और संभ्रांत लोग (अमीर) अपने गरम कपड़ों और महँगे गैजेट्स (कैमरे आदि) के साथ जीवन का आनंद ले रहे थे। हवा बहुत बर्फीली और ठंडी थी।

तभी लेखक और उनके मित्र की नज़र एक दस-बारह साल के बालक पर पड़ती है। वह बालक नंगे पैर था। उसके शरीर पर केवल एक फटा हुआ चीथड़ा (कमीज़) था। उसके सिर के बाल उलझे हुए थे और वह ठंड से काँप रहा था। वह भूखा और बेसहारा लग रहा था। लेखक और उनके मित्र उसके पास गए और उससे पूछताछ की।

बालक ने बताया कि वह पहाड़ से काम की तलाश में नैनीताल आया था। उसने कुछ दिन एक दुकान पर काम किया, लेकिन फिर उसे किसी कारणवश निकाल दिया गया। अब उसके पास न तो सिर छुपाने की जगह है, न खाने का पैसा, और न ही पहनने को कपड़े। इस कड़ाके की ठंड में वह सड़क के किनारे ही सोता है।

लेखक के मित्र ने बहुत सहानुभूतिपूर्वक (बनावटी रूप से) उसकी बातें सुनीं। उन्होंने सोचा कि किसी होटल वाले से कहकर इसे काम दिला दें, लेकिन फिर यह सोचकर अपना विचार त्याग दिया कि होटलों में ऐसे लड़कों को कोई नहीं रखता क्योंकि वे चोरी कर सकते हैं। वे बस उससे बातें करते रहे, लेकिन उसकी कोई वास्तविक (आर्थिक या कपड़ों की) मदद नहीं की।

अंत में लेखक और उनके मित्र ने यह कहते हुए अपने आप को सांत्वना दे दी कि "यह तो अपना-अपना भाग्य है।" यह कहकर वे वहाँ से चले गए, और वह बालक उसी ठंडी रात के अंधेरे में ठिठुरता हुआ वहीं रह गया।

अगले दिन सुबह के अखबारों में एक छोटी सी खबर छपी कि "नैनीताल की माल रोड पर कड़ाके की ठंड से ठिठुर कर एक अज्ञात बालक की मृत्यु हो गई।" लेकिन किसी को यह जानने की फुरसत नहीं थी कि वह बालक कौन था, कहाँ से आया था, और किसकी संवेदनहीनता ने उसकी जान ली।

4. कहानी के मुख्य उद्देश्य व संदेश (Themes & Message)

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5. महत्वपूर्ण पंक्तियाँ और उनकी व्याख्या (Important References)

"होटलों में तो ये सब चोर-उचक्के समझे जाते हैं, कोई नहीं रखता।"

प्रसंग: जब बात आई कि उस गरीब बालक को किसी होटल में काम दिला दिया जाए, तो लेखक के मित्र ने यह जवाब दिया।

व्याख्या: यह पंक्ति समाज की उस दोहरी और संदेहपूर्ण मानसिकता को दर्शाती है जहाँ गरीबी को ही अपराध मान लिया जाता है। समाज एक गरीब और असहाय बच्चे को मदद की नज़र से नहीं, बल्कि शक और घृणा की नज़र (चोर-उचक्का) से देखता है। इसी कारण उन्हें सम्मानजनक काम नहीं मिल पाता।

"मैंने कहा—यह तो अपना-अपना भाग्य है।"

प्रसंग: जब लेखक और उनके मित्र उस बालक की परेशानी सुनकर भी उसकी कोई मदद किए बिना वहाँ से जा रहे थे, तब यह वाक्य कहा गया।

व्याख्या: यह कहानी की सबसे व्यंग्यात्मक (satirical) पंक्ति है। लेखक और उनका मित्र शिक्षित और साधन-संपन्न होने के बावजूद उस बच्चे की मदद नहीं करते। उस बच्चे की दुर्दशा और अपनी निर्दयता को वे 'भाग्य' का नाम देकर खुद को दोषमुक्त कर लेते हैं। यह सिद्ध करता है कि समाज ने 'भाग्य' शब्द को केवल अपने बचाव और पलायनवाद के लिए ईजाद किया है।

6. परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर (Practice Zone)

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: पहाड़ी बालक की शारीरिक दशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर: वह दस-बारह साल का एक पहाड़ी अनाथ बालक था। उसका कद छोटा और शरीर अत्यंत दुबला-पतला था। नैनीताल की कड़ाके की सर्दियों में भी वह बिलकुल नंगे पैर था। उसके शरीर पर केवल एक फटा-पुराना कमीज़ (चीथड़ा) था जो उसके शरीर को ढक भी नहीं पा रहा था। ठंड के कारण उसका शरीर सिकुड़ रहा था और दाँत किटकिटा रहे थे। उसके सिर के बाल रूखे और उलझे हुए थे। कुल मिलाकर उसकी दशा अत्यंत दयनीय थी।


प्रश्न 2: लेखक और उसके मित्र ने बालक की क्या सहायता की? क्या वे उसकी मदद कर सकते थे?

उत्तर: लेखक और उनके मित्र ने बालक की वास्तव में कोई भी सहायता नहीं की। उन्होंने केवल उससे बातें कीं और सहानुभूति जताने का दिखावा किया। जब मदद करने का समय आया, तो "होटल वाले इन्हें चोर समझते हैं" कहकर उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
हाँ, वे निश्चित रूप से उसकी मदद कर सकते थे। वे एक पढ़े-लिखे और साधन-संपन्न व्यक्ति थे। वे उसे उस रात सोने के लिए कोई गर्म जगह (कंबल) दे सकते थे, खाने के लिए कुछ खरीद कर दे सकते थे, या होटल में अपनी पहचान से उसे कुछ काम दिला सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया और उसे उसी बर्फानी रात में मरने के लिए छोड़ दिया।


प्रश्न 3: कहानी का शीर्षक 'अपना-अपना भाग्य' किस बात पर व्यंग्य करता है?

उत्तर: कहानी का शीर्षक पूर्णतः व्यंग्यात्मक है। यह समाज की उस संवेदनहीनता पर प्रहार करता है जहाँ संपन्न लोग गरीबों के सुख-दुख को उनकी 'किस्मत' (भाग्य) मानकर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं। उस बच्चे की मौत भगवान या किस्मत के कारण नहीं हुई थी, बल्कि समाज (लेखक, उनके मित्र और नैनीताल के अमीर लोगों) की क्रूरता और मदद न करने की प्रवृत्ति के कारण हुई थी। अपनी अमानवीयता को छिपाने के लिए लोग 'भाग्य' का सहारा लेते हैं।